तमिलनाडु विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के दौरान मतदान अधिकार को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को तीखी बहस देखने को मिली। मामला टीवीके विधायक श्रीनिवास सेतुपति से जुड़ा है, जिन्हें मद्रास हाई कोर्ट के आदेश के बाद फ्लोर टेस्ट में मतदान करने से रोक दिया गया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए विधायक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच कर रही है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह आदेश स्पष्ट रूप से न्यायिक मर्यादा की अवहेलना है और इस तरह किसी विधायक को फ्लोर टेस्ट में वोट डालने से रोकना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है।

सिंघवी ने अदालत में कहा कि अगर किसी आदेश की कड़ी आलोचना होनी चाहिए, तो वह यही आदेश है। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष यह तर्क देगा कि फ्लोर टेस्ट शुरू हो चुका है, लेकिन इससे मूल संवैधानिक प्रश्न खत्म नहीं हो जाता।

यह तो बेहद ही गलत है

इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि चलिये, पहले रोहतगी की बात सुन लेते हैं। वहीं सुनवाई के दौरान बेंच में शामिल जस्टिस मेहता ने हाईकोर्ट के आदेश पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा- आप स्थगन आदेश पर भी कारण बताने वाला आदेश चाहते हैं? यह तो बेहद ही गलत है।

दरअसल, पूरा विवाद उस चुनावी सीट से जुड़ा है, जहां डीएमके उम्मीदवार पेरियाकरुप्पन केवल एक वोट से चुनाव हार गए थे। डीएमके की ओर से दायर याचिका में दावा किया गया कि उनके समर्थन में पड़ा एक डाक मत गलती से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में भेज दिया गया था, जिससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ।

प्रतिवादी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रहतोगी ने कहा कि मैं एक वोट से हार गया हूं। इस पर बेंच ने सवाल किया कि तो आप रिट याचिका दायर करेंगे? अदालत ने यह भी संकेत दिया कि जब हाईकोर्ट स्वयं कह चुका है कि उचित उपाय चुनाव याचिका है, तब अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पर विचार करना असामान्य प्रतीत होता है। सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों को मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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